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रात मैं इस कश्मकश में एक पल सोया नहीं | शाही शायरी
raat main is kashmakash mein ek pal soya nahin

ग़ज़ल

रात मैं इस कश्मकश में एक पल सोया नहीं

अमजद इस्लाम अमजद

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रात मैं इस कश्मकश में एक पल सोया नहीं
कल मैं जब जाने लगा तो उस ने क्यूँ रोका नहीं

यूँ अगर सोचूँ तो इक इक नक़्श है सीने पे नक़्श
हाए वो चेहरा कि फिर भी आँख में बनता नहीं

क्यूँ उड़ाती फिर रही है दर-ब-दर मुझ को हवा
मैं अगर इक शाख़ से टूटा हुआ पत्ता नहीं

आज तन्हा हूँ तो कितना अजनबी माहौल है
एक भी रस्ते ने तेरे शहर में रोका नहीं

हर्फ़ बर्ग-ए-ख़ुश्क बन कर टूटते गिरते रहे
ग़ुंचा-ए-अर्ज़-ए-तमन्ना होंट पर फूटा नहीं

दर्द का रस्ता है या है साअ'त-ए-रोज़-ए-हिसाब
सैकड़ों लोगों को रोका एक भी ठहरा नहीं

शबनमी आँखों के जुगनू काँपते होंटों के फूल
एक लम्हा था जो 'अमजद' आज तक गुज़रा नहीं