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रात लम्बी थी सितारा मिरा ताजील में था | शाही शायरी
raat lambi thi sitara mera tajil mein tha

ग़ज़ल

रात लम्बी थी सितारा मिरा ताजील में था

नोमान शौक़

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रात लम्बी थी सितारा मिरा ताजील में था
जिस को जलना नहीं आया वही क़िंदील में था

इक जहाँ और पस-ए-कार-ए-जहाँ था बाक़ी
इक बदन और मिरे इश्क़ की तकमील में था

फिर सियाही ने समेटा मिरा सामान आ कर
कुल असासा मिरा इक शाम की ज़म्बील में था

एक लर्ज़ा था सितारों के बदन पर तारी
मैं तो डूबा हुआ इक हुस्न की तफ़्सील में था

अब तो हर चेहरा उसे ज़र्द दिखाई देगा
देर तक आईना बीमार की तहवील में था

जो मिला वो बड़ी उजलत में मिला था मुझ से
और मैं गोया हमेशा से ही तातील में था