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रात की सारी हक़ीक़त दिन में उर्यां हो गई | शाही शायरी
raat ki sari haqiqat din mein uryan ho gai

ग़ज़ल

रात की सारी हक़ीक़त दिन में उर्यां हो गई

रौनक़ रज़ा

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रात की सारी हक़ीक़त दिन में उर्यां हो गई
ख़्वाब की ताबीर पढ़ कर आँख हैराँ हो गई

हर नफ़्स सैल-ए-हवादिस हर क़दम अमवाज-ए-ग़म
ज़िंदगी इस दौर में तूफ़ाँ ही तूफ़ाँ हो गई

आरज़ू-दर-आरज़ू बढ़ती गईं महरूमियाँ
हर तमन्ना रफ़्ता रफ़्ता दुश्मन-ए-जाँ हो गई

कितनी बे-मअ'नी रिफ़ाक़त अब्र के टुकड़ों में थी
देख कर मेरे घरौंदे बर्क़-ओ-बाराँ हो गई

वो तिरे बचपन की चिंगारी भी थी मौसम-शनास
जब जवाँ होने के दिन आए फ़रोज़ाँ हो गई

सोज़-ए-दिल दर्द-ए-जिगर ख़ून-ए-तमन्ना अश्क-ए-ग़म
एक लग़्ज़िश कितने अफ़्सानों का उनवाँ हो गई