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राह कर के उस बुत-ए-गुमराह ने धोका दिया | शाही शायरी
rah kar ke us but-e-gumrah ne dhoka diya

ग़ज़ल

राह कर के उस बुत-ए-गुमराह ने धोका दिया

मुनीर शिकोहाबादी

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राह कर के उस बुत-ए-गुमराह ने धोका दिया
गिर पड़े अंधे कुएँ में चाह ने धोका दिया

हो गए मग़रूर मुझ को आशिक़ अपना जान कर
हाए उस दिल का बुरा हो आह ने धोका दिया

जान कर उस बुत का घर काबे को सज्दा कर लिया
ऐ बरहमन मुझ को बैतुल्लाह ने धोका दिया

मैं ने जाना बाल मुँह पर खोल कर आए हुज़ूर
छुप कर अब्र-ए-तर में क़ुर्स-ए-माह ने धोका दिया

शेख़ साहब आप को बुत-ख़ाने में लाया 'मुनीर'
पीर-ओ-मुर्शिद बंदा-ए-दरगाह ने धोका दिया