क़ुबूल था कि फ़लक मुझ पे सौ जफ़ा करता
पर एक ये कि न तुझ से मुझे जुदा करता
करूँ हूँ शाद दिल अपना तिरे तसव्वुर से
अगर ये शग़्ल न होता तो क्या किया करता
सफ़ेद सफ़हा-ए-काग़ज़ कहीं न फिर रहता
अगर मैं जौर-ओ-जफ़ा को तिरी लिखा करता
हिना की तरह अगर दस्तरस मुझे होती
तो किस ख़ुशी से तिरे पाँव में लगा करता
ग़म-ए-फ़िराक़ गर ऐसा मैं जानता 'बेदार'
तो अपने दिल को किसी से न आश्ना करता
ग़ज़ल
क़ुबूल था कि फ़लक मुझ पे सौ जफ़ा करता
मीर मोहम्मदी बेदार

