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क़ुबूल था कि फ़लक मुझ पे सौ जफ़ा करता | शाही शायरी
qubul tha ki falak mujh pe sau jafa karta

ग़ज़ल

क़ुबूल था कि फ़लक मुझ पे सौ जफ़ा करता

मीर मोहम्मदी बेदार

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क़ुबूल था कि फ़लक मुझ पे सौ जफ़ा करता
पर एक ये कि न तुझ से मुझे जुदा करता

करूँ हूँ शाद दिल अपना तिरे तसव्वुर से
अगर ये शग़्ल न होता तो क्या किया करता

सफ़ेद सफ़हा-ए-काग़ज़ कहीं न फिर रहता
अगर मैं जौर-ओ-जफ़ा को तिरी लिखा करता

हिना की तरह अगर दस्तरस मुझे होती
तो किस ख़ुशी से तिरे पाँव में लगा करता

ग़म-ए-फ़िराक़ गर ऐसा मैं जानता 'बेदार'
तो अपने दिल को किसी से न आश्ना करता