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क़यामत है जो ऐसे पर दिल-ए-उम्मीद-वार आए | शाही शायरी
qayamat hai jo aise par dil-e-ummid-war aae

ग़ज़ल

क़यामत है जो ऐसे पर दिल-ए-उम्मीद-वार आए

बेख़ुद देहलवी

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क़यामत है जो ऐसे पर दिल-ए-उम्मीद-वार आए
जिसे वादे से नफ़रत हो जिसे मिलने से आर आए

मिरी बे-ताबियाँ छा जाएँ या-रब उन की तमकीं पर
तड़पता देख लूँ आँखों से जब मुझ को क़रार आए

मिटा दूँ अपनी हस्ती ख़ाक कर दूँ अपने-आपे को
मिरी बातों से गर दुश्मन के भी दिल में ग़ुबार आए

इजाज़त माँगती है दुख़्त-ए-रज़ महफ़िल में आने की
मज़ा हो शैख़-साहिब कह उठें बे-इख़्तियार आए

ख़ुदा जाने कि वो 'बेख़ुद' से इतने बद-गुमाँ क्यूँ हैं
कि हर जलसे में फ़रमाते हैं देखो होशियार आए