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क़रार दीदा-ओ-दिल में रहा नहीं है बहुत | शाही शायरी
qarar dida-o-dil mein raha nahin hai bahut

ग़ज़ल

क़रार दीदा-ओ-दिल में रहा नहीं है बहुत

सय्यद काशिफ़ रज़ा

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क़रार दीदा-ओ-दिल में रहा नहीं है बहुत
नज़र-नवाज़ मिरे कोई गुल सुरीं है बहुत

रखा न हो किसी ख़्वाहिश ने सर ब-ख़ूँ इस को
तुम्हारा होंट कई दिन से आतिशीं है बहुत

मिला नहीं है मुझे वो मगर पता है मुझे
वो दूसरों के लिए भी बचा नहीं है बहुत

खुला न एक भी दर सर-कशीदगी पे मिरी
हुआ हूँ ख़ाक तो दामन-कुशा ज़मीं है बहुत

रखा हुआ था सर-ए-ताक़-ए-दिल इक आईना
बहुत दिनों से कोई आइना-नशीं है बहुत

तुम्हारा हुस्न ही शोला-फ़ज़ा नहीं है मुझे
मिरा लहू भी कई दिन से आतिशीं है बहुत

मैं लहर लहर उसे जिस्म-ओ-जाँ पे ओढ़ता हूँ
ग़िलाफ़ ऐसा तिरा लम्स-ए-मख़मलीं है बहुत