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क़लम हो जाए सर पर्वा न करना | शाही शायरी
qalam ho jae sar parwa na karna

ग़ज़ल

क़लम हो जाए सर पर्वा न करना

आजिज़ मातवी

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क़लम हो जाए सर पर्वा न करना
अमीर-ए-शहर को सज्दा न करना

किया तर्क-ए-तअ'ल्लुक़ तुम ने बेहतर
मगर उस का कहीं चर्चा न करना

मुझे तुर्बत में अज़-हद आफ़ियत है
मसीहा अब मुझे ज़िंदा न करना

बढ़ाता है कसल दूरी-ए-मंज़िल
ख़याल-ए-वुसअ'त-ए-सहरा न करना

कठिन हो जाएगी मंज़िल-शनासी
कभी मस्ख़ उन का नक़्श-ए-पा न करना

मोहब्बत में ये है दस्तूर-ए-दुनिया
ज़रा सी बात को इफ़्शा न करना

ये है अब इक तरीक़ा गुफ़्तुगू का
किसी के सामने लब वा न करना

तुम्हारे मुँह पे वो सच बोल देगा
मुक़ाबिल अपने आईना न करना

मुनासिब है कि 'आजिज़' तौबा कर लो
न तज़हीक-ए-मय-ओ-मय-ख़ाना करना