EN اردو
क़ातिल-ए-आलम से क्या याराना है | शाही शायरी
qatil-e-alam se kya yarana hai

ग़ज़ल

क़ातिल-ए-आलम से क्या याराना है

मिर्ज़ा मासिता बेग मुंतही

;

क़ातिल-ए-आलम से क्या याराना है
दिल चराग़-ए-गोर का परवाना है

हर मकाँ में जल्वा-ए-जानाना है
आशिक़ों का हर जगह अफ़्साना है

छीन लेगा बहर-ए-ज़ुल्फ़-ए-अम्बरीं
ये दिल-ए-सद-चाक रश्क-ए-शाना है

लोग कहते हैं जिसे पीर-ए-मुग़ाँ
यार का क्या जल्वा-ए-मस्ताना है

हल्क़ा-ए-आ'दा में है वो सीम-बर
गंज है जिस जा वहाँ वीराना है

जिस जगह चलते थे कल जाम-ए-शराब
आज वाँ उल्टा हुआ पैमाना है

बैअत-ए-दस्त-ए-सुबू से ये खुला
सब से बेहतर मशरब-ए-रिंदाना है

क्यूँ न फाँसे दौलत-ए-दुनिया हमें
है वहाँ पर दाम जिस जा दाना है

मर्द-ए-आख़िर-बीं के आगे मुनइमों
कसरत-ए-हस्ती भी इक वीराना है

काम क्या है उस को मुल्क-ओ-माल से
पास जिस के हिम्मत-ए-मर्दाना है

हिज्र में अश्क-ए-मुसलसल ज़ाहिदा
आशिक़ों का सुब्हा-ए-सद-दाना है

'मुंतही' ज़ेर-ए-क़दम उस यार के
सर कटाना सज्दा-ए-शुकराना है