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प्यास लगना थी लगी सरशार होना था हुए | शाही शायरी
pyas lagna thi lagi sarshaar hona tha hue

ग़ज़ल

प्यास लगना थी लगी सरशार होना था हुए

ख़ालिद अहमद

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प्यास लगना थी लगी सरशार होना था हुए
हम को ग़र्क़ाब-ए-सराब-ए-दार होना था हुए

हम तिरी आहट पे सड़कों पर निकल आए तो क्या
हम को रुस्वा बर-सर-ए-बाज़ार होना था हुए

तेरे काँधों के लिए सर दे के आख़िर क्या गया
हम को यूँ भी बे-सर-ओ-दस्तार होना था हुए

तू कहे तो अपने हाथों अपनी शह-ए-रग काट लें
हम को तेरे हाथ की तलवार होना था हुए

ख़्वाब के आलम में चलने का मरज़ कब जा सका
ख़्वाब ही में नींद से बेदार होना था हुए

इन सरों की और इन महलों की क़िस्मत एक थी
संग चलना थे चले मिस्मार होना था हुए

एक दिन 'ख़ालिद' हमें ये स्वाँग भरना था भरा
झूट थे घड़े फ़नकार होना था हुए