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प्यार का अब्र खुल के बरसा है | शाही शायरी
pyar ka abr khul ke barsa hai

ग़ज़ल

प्यार का अब्र खुल के बरसा है

नियाज़ हुसैन लखवेरा

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प्यार का अब्र खुल के बरसा है
टूट कर मैं ने तुझ को चाहा है

इस से बढ़ कर जुदाई क्या होगी
अब तो आँखों से ख़ून बहता है

शायद अब फिर कभी न मिल पाएँ
मैं ने ख़्वाबों में तुझ को देखा है

इक किरन को तरस रहे हैं हम
सेहन-ए-दिल में बड़ा अंधेरा है

सब को फूलों की आरज़ू है 'नियाज़'
कौन पत्तों से प्यार करता है