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फूल हो कर फूल को क्या चाहना | शाही शायरी
phul ho kar phul ko kya chahna

ग़ज़ल

फूल हो कर फूल को क्या चाहना

हकीम मंज़ूर

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फूल हो कर फूल को क्या चाहना
जब ये बे-आँगन था जब था चाहना

ज़ख़्म सारे ही हैं अपने जिस्म-ज़ाद
किस सबब उन का तमाशा चाहना

फिर से हो तज्दीद-ए-ख़ुशबू सोचिए
चाहना और वो भी अपना चाहना

एक मुश्किल राज़दारी चाहिए
एक मुश्किल चाहतों का चाहना

दस्त-गीरी ऐ नम आँखों वाली सुब्ह
चाहना क्या चाहना क्या चाहना

चाँद की आयत समुंदर पर पढ़ो
चाहना उस को तो ऐसा चाहना

हस्ब-ज़ा 'मंज़ूर' मेरा नाम है
काम मेरा सब का अच्छा चाहना