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फिसलने वाला था ख़ुद को मगर सँभाल गया | शाही शायरी
phisalne wala tha KHud ko magar sambhaal gaya

ग़ज़ल

फिसलने वाला था ख़ुद को मगर सँभाल गया

मुबारक अंसारी

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फिसलने वाला था ख़ुद को मगर सँभाल गया
अजीब शख़्स था वो बात हंस के टाल गया

बदलने वाली है रुत साएबान से निकलो
जो शो'ला-बार था वो अब्र बर्शगाल गया

तुम अपने आप को पहचान भी न पाओगे
वो रौशनी में अंधेरा अगर उछाल गया

नक़ाब अपनी बुराई पे डालनी थी उसे
वो ला के ख़ाक मिरी नेकियों पे डाल गया

क़ुसूर-वार मैं ठहराऊँ आईने को क्यूँ
जो बोलता था तिरा अब वो ख़द्द-ओ-ख़ाल गया

मिज़ाज अपना 'मुबारक' बदल दिया मैं ने
ख़याल उस का गए वक़्त की मिसाल गया