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फिर तिरा शहर तिरी राहगुज़र हो कि न हो | शाही शायरी
phir tera shahr teri rahguzar ho ki na ho

ग़ज़ल

फिर तिरा शहर तिरी राहगुज़र हो कि न हो

हुसैन ताज रिज़वी

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फिर तिरा शहर तिरी राहगुज़र हो कि न हो
और हो भी तो मुझे शौक़-ए-सफ़र हो कि न हो

हो न हो फिर से रग-ओ-पय में शरारों का गुमाँ
फिर कभी दोश पे मेरे तिरा सर हो कि न हो

माँग लूँ तेरे हवाले से तो शायद मिल जाए
क्या ख़बर सिर्फ़ दुआओं में असर हो कि न हो

ना-उमीदी के ये शब-ज़ाद डराते हैं मुझे
तेरे आने से मुनव्वर मिरा घर हो कि न हो

मुझ से भूला न गया उन के लबों का वो खिंचाव
याद उन को भी मिरा दीदा-ए-तर हो कि न हो

अब भी आ जाओ कोई देर खुली हैं आँखें
क्या ख़बर फिर कभी दीवार में दर हो कि न हो

माँ के आँचल के तले बैठ लो कुछ देर ऐ 'ताज'
क्या ख़बर आगे ये साया ये शजर हो कि न हो