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फिर कोई महशर उठाने मेरी तन्हाई में आ | शाही शायरी
phir koi mahshar uThane meri tanhai mein aa

ग़ज़ल

फिर कोई महशर उठाने मेरी तन्हाई में आ

सलीम शाहिद

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फिर कोई महशर उठाने मेरी तन्हाई में आ
अपने होने की ख़बर ले कर कभी बस्ती में आ

देखना ठहरा तो फिर इक ये तमाशा भी सही
आग लगने की ख़बर सुन कर ही अब खिड़की में आ

ऐ मिरे होंटों की लज़्ज़त शाख़ को बोझल न कर
इक हिलोरे में शजर से टूट कर झोली में आ

जुर्म-ए-बे-लज़्ज़त है साहिल पर तिरी तर-दामनी
या पलट ख़ुश्की की जानिब या खुले पानी में आ

तोड़ भी दे हल्क़ा-ए-याराँ बहुत शब ढल चुकी
नक़्ल-ए-ज़िंदानी को घर की चार-दीवारी में आ

मेरे पैरों में तो ज़ंजीरें गली कूचों की हैं
मुझ से मिलने शहर की गुंजान आबादी में आ

ख़्वाहिश-ए-बे-ख़ानुमाँ को ला मकान-ए-हर्फ़ में
नौ-वलद बच्चे की सूरत पैकर-ए-मा'नी में आ

नींद कुछ कर ले कि ताज़ा आँख पे सूरज खुले
सुब्ह साहिल पर उतरना है तो इस कश्ती में आ

ख़ून शिरयानों का आँखों में दिखाई दे सके
तू भी दरिया है अगर 'शाहिद' तो तुग़्यानी में आ