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फेर रोज़-ए-फ़िराक़-ए-यार आया | शाही शायरी
pher roz-e-firaq-e-yar aaya

ग़ज़ल

फेर रोज़-ए-फ़िराक़-ए-यार आया

क़ासिम अली ख़ान अफ़रीदी

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फेर रोज़-ए-फ़िराक़-ए-यार आया
नामा-बर आह ज़ार ज़ार आया

तेरे जाने से फ़ित्ना हो तय्यार
ब-सर-ए-चश्म अश्क-बार आया

झाड़ा मरक़द पे मेरे जब दामन
आसमाँ का गोया ग़ुबार आया

मय से तौबा तो कर नहीं सकता
क्या करूँ मौसम-ए-बहार आया

मारा जावेगा भाग ऐ नासेह
देख ये नाज़नीं सवार आया

किसी मख़्लूक़ को ख़ुदा न दिखाए
जो कि मुझ पर दर-इंतिज़ार आया

इस की बेदाद का ख़ुदा दे अज्र
हाथ में ले के ज़ुल-फ़िक़ार आया

कहता है सर झुका जो आशिक़ है
मैं तो अब माइल-ए-शिकार आया

'आफ़रीदी' समझ हयात-ए-अबद
क़त्ल को तेरे गर वो यार आया

पेशवाई को इस की जा जल्दी
कह कि हाज़िर गुनाहगार आया

तुझे 'क़ासिम-अली' ख़ुदा की क़सम
कैसे ज़ालिम पे ए'तिबार आया