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फेंकी किसी ने कंकरी दिल यक-ब-यक दरिया हुआ | शाही शायरी
phenki kisi ne kankari dil yak-ba-yak dariya hua

ग़ज़ल

फेंकी किसी ने कंकरी दिल यक-ब-यक दरिया हुआ

सय्यद अमीन अशरफ़

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फेंकी किसी ने कंकरी दिल यक-ब-यक दरिया हुआ
दरिया में इक सैलाब था सैलाब था उमडा हुआ

दिल में कोई आज़ार था वो मुझ से यूँ गोया हुआ
आज़ुर्दा-ए-तासीर हूँ दिल दे दिया अच्छा हुआ

गाहे ब-रंग-ए-मेहरबाँ गाहे ख़याल-ए-बद-गुमाँ
वो भी तो आख़िर फूल है काँटों में है उलझा हुआ

इस तरह चश्म-ए-नीम-वा ग़ाफ़िल भी थी बेदार भी
जैसे नशा हो रात का या सुब्ह का तड़का हुआ

लुत्फ़-ए-नज़र वो शय लगी जो जिस क़दर थी अजनबी
रस्ता न था जाना हुआ चेहरा न था देखा हुआ

ऐ ख़ातिर-ए-मेहर-आश्ना उस के तलव्वुन पर न जा
ये बे-रुख़ी थी इक अदा वो सर्व था सीधा हुआ

वो इल्म हो या शाइ'री वो फ़क़्र हो या सरवरी
हम जिस क़दर झुकते गए क़द और भी ऊँचा हुआ

जंग-ओ-जदल के वास्ते आख़िर बड़े क्यूँ आ गए
बाज़ीचा-ए-अतफ़ाल था झगड़ा कोई झगड़ा हुआ