फल जाए मोहब्बत तो मोहब्बत है मोहब्बत
और रास न आए तो मुसीबत है मोहब्बत
सरमाया-ए-दीवाना-ए-उल्फ़त है मोहब्बत
ऐ उल्टे हुए दिल तिरी क़ीमत है मोहब्बत
है हम ही तलक ख़ैर ग़नीमत है मोहब्बत
हो जाए उन्हें भी तो क़यामत है मोहब्बत
रो रो के वो पोछेंगे मिरी आँख से आँसू
आएँगे वो दिन भी जो सलामत है मोहब्बत
बदनाम किया लाख तुझे ख़ुद-ग़रज़ों ने
फिर भी तिरी दुनिया को ज़रूरत है मोहब्बत
दुनिया कहे कुछ है मगर ईमान की ये बात
होने की तरह हो तो इबादत है मोहब्बत
है जिन से उन आँखों की क़सम खाता हूँ 'मंज़र'
मेरे लिए परवाना-ए-जन्नत है मोहब्बत
ग़ज़ल
फल जाए मोहब्बत तो मोहब्बत है मोहब्बत
मंज़र लखनवी

