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पत्थर से मुकालिमा है जारी | शाही शायरी
patthar se mukalima hai jari

ग़ज़ल

पत्थर से मुकालिमा है जारी

जमाल ओवैसी

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पत्थर से मुकालिमा है जारी
दोनों ही तरफ़ है होशियारी

वहशत से मैं भागता रहा हूँ
फिर मुझ पे जुनूँ हुआ है तारी

दरवेश को रख के ख़ाक-ए-पा में
करता है ज़माना शहरयारी

पत्थर से मुझे न चोट पहुँची
इक गुल ने दिया है ज़ख़्म कारी

शहरी वतन-ए-अज़ीज़ का हूँ
लेकिन है शिआ'र अश्क-बारी

मज़हब है मिरा तरीक़-ए-हिन्दी
देरीना बुतों से अपनी यारी

पाया है फ़रोग़-ए-सेकुलरिज़्म
तलवार हुई है अब दो धारी

गुज़रे हुए दिन का इस्तिआ'रा
ये मौलवी और ये भिकारी