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पस-ए-ग़ुबार-ए-हवस रात ढलती रहती है | शाही शायरी
pas-ghubar-e-hawas raat Dhalti rahti hai

ग़ज़ल

पस-ए-ग़ुबार-ए-हवस रात ढलती रहती है

मज़हर इमाम

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पस-ए-ग़ुबार-ए-हवस रात ढलती रहती है
नशे में चूर पिघलती मचलती रहती है

ख़बर यही है कि आग़ोश-ए-हिज्र में पहरों
तुम्हारी याद भी पहलू बदलती रहती है

ये मैं ने देखा है अक्सर फटी पुरानी हयात
सर-ए-दरीचा-ए-शब हाथ मलती रहती है

क़फ़स से हम भी निकलने को कब से हैं बे-ताब
मगर वो साअ'त-ए-आख़िर जो टलती रहती है

वो रंग रंग बहाराँ है खुलता रहता है
वो शाख़ शाख़ समर-वर है फलती रहती है

है एक कार-ए-ज़ियाँ शहर शहर दर-बदरी
मगर यही कि तबीअ'त बहलती रहती है