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पस-ए-ग़ुबार-ए-तलब ख़ौफ़-ए-जुस्तुजू है बहुत | शाही शायरी
pas-e-ghubar-e-talab KHauf-e-justuju hai bahut

ग़ज़ल

पस-ए-ग़ुबार-ए-तलब ख़ौफ़-ए-जुस्तुजू है बहुत

सुल्तान अख़्तर

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पस-ए-ग़ुबार-ए-तलब ख़ौफ़-ए-जुस्तुजू है बहुत
रफ़ीक़-ए-राह मगर उन की आरज़ू है बहुत

लरज़ के टूट ही जाए न आज बर्ग-ए-बदन
लहू में क़ुर्ब की गर्मी रगों में लू है बहुत

उलझ गया है वो ख़्वाहिश के जाल में या'नी
फ़रेब-ए-रंग-ए-हवस अब के दू-ब-दू है बहुत

कटा-फटा सही मल्बूस-ए-कोहनगी न उतार
तिरे लिए यही दीवार-ए-आबरू है बहुत

मिज़ाज-ए-वक़्त की तस्वीर बन गए हम लोग
लबों पे बर्फ़ जमी है दिलों में लू है बहुत

हरा-भरा नज़र आता है यूँ तो वो 'अख़्तर'
दयार-ए-दिल में मगर क़हत-ए-रंग-ओ-बू है बहुत