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परेशान ऐ ज़ुल्फ़-ए-बहर-दम न हो | शाही शायरी
pareshan ai zulf-e-bahar-dam na ho

ग़ज़ल

परेशान ऐ ज़ुल्फ़-ए-बहर-दम न हो

जोशिश अज़ीमाबादी

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परेशान ऐ ज़ुल्फ़-ए-बहर-दम न हो
सिनान-ए-मिज़ा की तू परचम न हो

तबीबो यही आरज़ू है मुझे
सर-ए-दाग़ पर पा-ए-मरहम न हो

मरा हाल दरहम न हो इस क़दर
जो ज़ुल्फ़-ए-सियह उस की बरहम न हो

जफ़ा-कार हो तेरी दौलत ज़ियाद
मिरा आह-ओ-नाला कभी कम न हो

जलूँ शम्अ-साँ गरमी-ए-इश्क़ से
दम-ए-सर्द मेरा जो बे-दम न हो

वही दम दम-ए-आख़िरी हो मिरा
तिरी याद में सर्फ़ जो दम न हो

सफ़ा-पर्वराँ शोला-रू मिल चुका
कभी आग और पानी बाहम न हो

लबों पर तिरे दाँत तो है मगर
डरूँ हूँ कहीं ये शकर सम न हो

सदा रू-ब-रू है वो ख़ुर्शीद-रू
कभी ख़ुश्क ये दीदा-ए-नम न हो

न सज्दा करे कोई मेहराब को
सर उस का तवाज़ो से गर ख़म न हो

ग़म उस का जो हो ख़ाना-पर्दाज़-ए-दिल
तो 'जोशिश' कसी चीज़ का ग़म न हो