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परछाइयों की बात न कर रंग-ए-हाल देख | शाही शायरी
parchhaiyon ki baat na kar rang-e-haal dekh

ग़ज़ल

परछाइयों की बात न कर रंग-ए-हाल देख

शमीम हनफ़ी

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परछाइयों की बात न कर रंग-ए-हाल देख
आँखों से अब हवा-ओ-हवस का मआ'ल देख

दो शेर जिस के क़हर की जंगल में धूम थी
मेरी नशिस्त-गाह में अब उस की खाल देख

ख़ुश्बू की तरह गूँज उठा हर्फ़-ए-आगही
ऐ दिल ज़रा हिसार-ए-नफ़स का ज़वाल देख

तुझ से क़रीब आए तो अपनी ख़बर न थी
दूरी का ये अज़ाब ब-रंग-ए-विसाल देख

बुझती हुई सदा की तरह ख़ुद में डूब जा
पेश-ए-निगाह जब भी तमन्ना का जाल देख

पलकों में तेज़ धूप का मंज़र समेट ले
फिर कासा-ए-बदन में लहू का उबाल देख