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पैदा किया है उड़ती हुई ख़ाक से मुझे | शाही शायरी
paida kiya hai uDti hui KHak se mujhe

ग़ज़ल

पैदा किया है उड़ती हुई ख़ाक से मुझे

रफ़ीक राज़

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पैदा किया है उड़ती हुई ख़ाक से मुझे
निस्बत यही है सरसर-ए-सफ़्फ़ाक से मुझे

अब तो असीर-ए-गर्दिश-ए-लैल-ओ-नहार हूँ
मुद्दत हुई है उतरे हुए चाक से मुझे

आएगा कोई खोलेगा बंद-ए-क़बा-ए-हर्फ़
देगा नजात काग़ज़ी पोशाक से मुझे

दुनिया है इश्वा-साज़ तो मैं हूँ मकीन-ए-ज़ात
ख़तरा नहीं है इस ज़न-ए-बेबाक से मुझे

पर फड़फड़ा रहा हूँ बसीरत के दाम में
कोई छुड़ाए कब्ज़ा-ए-इदराक से मुझे

रह जाएगी लकीर लहू की ज़मीन पर
ले जाइए न बाँध के फ़ितराक से मुझे

मुझ से ज़मीन ख़ौफ़-ज़दा है 'रफ़ीक़-राज़'
ये जानती है रब्त है अफ़्लाक से मुझे