पैदा हुआ ये हबाब कैसा
दरिया में है पेच-ओ-ताब कैसा
अब फ़स्ल-ए-जुनूँ कहाँ है बाक़ी
फिर देख रहा हूँ ख़्वाब कैसा
था दस्त-ए-हुनर में मोम सा जो
पथरा गया वो शबाब कैसा
सिम-सिम की सदा पे खुल रहा था
था हल्क़ा-ए-दर-ए-सराब कैसा
एक एक वरक़ पढ़ा हुआ सा
है नुस्ख़ा-ए-इंतिख़ाब कैसा
परतव से तिरे वजूद मेरा
आग़ोश में ले हिजाब कैसा
क्या जाने हमारी तल्ख़-कामी
है ज़ाइक़ा-ए-शराब कैसा
ख़ुशबुएँ तवाफ़ कर रही थीं
था पिछले पहर ख़िताब कैसा
क़तरा क़तरा चमक रहा है
रौशन हुआ ज़ेर-ए-आब कैसा
मैं अपने ख़िलाफ़ हो गया हूँ
नाज़िल हुआ ये अज़ाब कैसा
मुद्दत से है बंद क़ुफ़्ल-ए-अबजद
ऐ मुहतसिबो हिसाब कैसा
सब मौज-ए-हवा में रंग उस के
ऐ मोमिनो इज्तिनाब कैसा
दीवार का बोझ बाम पर है
ये घर भी हुआ ख़राब कैसा
ग़ज़ल
पैदा हुआ ये हबाब कैसा
अबुल हसनात हक़्क़ी

