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पए सज्दा अगर मुझ को न तेरा आस्ताँ मिलता | शाही शायरी
pae sajda agar mujhko na tera aastan milta

ग़ज़ल

पए सज्दा अगर मुझ को न तेरा आस्ताँ मिलता

अज़ीज़ वारसी

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पए सज्दा अगर मुझ को न तेरा आस्ताँ मिलता
जो पैहम मिलने वाला था सुकून-ए-दिल कहाँ मिलता

मिरी मस्ती पे ज़ाहिद किस लिए अब रश्क करता है
तिरी तक़दीर में होता तो लुत्फ़-ए-जावेदाँ मिलता

हरम तक ही अगर महदूद होती आशिक़ी अपनी
तुम ही सोचो कि फिर तुम सा बुत-ए-काफ़िर कहाँ मिलता

मिरी शफ़्फ़ाफ़ पेशानी ने मेरी लाज रख ली है
मुझे क्या क्या समझते तुम जो सज्दों का निशाँ मिलता

'अज़ीज़'-ए-वारसी जो तुम भी इब्न-उल-वक़्त हो जाते
तुम्हारा तज़्किरा भी दास्ताँ-दर-दास्ताँ मिलता