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पास-ए-वहशत है तो याद-ए-रुख़-ए-लैला भी न कर | शाही शायरी
pas-e-wahshat hai to yaad-e-ruKH-e-laila bhi na kar

ग़ज़ल

पास-ए-वहशत है तो याद-ए-रुख़-ए-लैला भी न कर

रविश सिद्दीक़ी

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पास-ए-वहशत है तो याद-ए-रुख़-ए-लैला भी न कर
इश्क़ को क़ैदी-ए-ज़ंजीर-ए-तमन्ना भी न कर

मौज-ए-ख़ुद्दार अगर है तो सू-ए-ग़ैर न देख
किसी तूफ़ाँ किसी साहिल का भरोसा भी न कर

ज़ीनत-ए-दहर इक आराइश-ए-बातिल ही सही
निगह-ए-शौक़ को महरूम-ए-तमाशा भी न कर

शिर्क है शिर्क ये ऐ वाइ'ज़-ए-आशुफ़्ता-ख़याल
ग़म-ए-उक़्बा को शरीक-ए-ग़म-ए-दुनिया भी न कर

कैफ़-अंगेज़ नहीं बादा-ए-इमरोज़ न हो
दिल को हसरत-कश-ए-पैमाना-ए-फ़र्दा भी न कर

महरम-ए-राज़-ए-मोहब्बत है अगर दिल तेरा
तो ख़ुदा के लिए इस राज़ को रुस्वा भी न कर

हैरत-ए-शौक़ ही बन जाए न ग़म्माज़ 'रविश'
तो इस अंदाज़ से नादाँ उसे देखा भी न कर