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पास-ए-आदाब तिरे हुस्न का करते करते | शाही शायरी
pas-e-adab tere husn ka karte karte

ग़ज़ल

पास-ए-आदाब तिरे हुस्न का करते करते

इश्क़ औरंगाबादी

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पास-ए-आदाब तिरे हुस्न का करते करते
तुझ को देखा भी कभी हूँगा तो डरते डरते

मुस्तइद हो के मिरे क़त्ल पे आया जल्लाद
में ने ये शेर पढ़ा दर्द से मरते मरते

बारे सद-शुक्र ख़ुदा का कि बर आई उम्मीद
आरज़ू आज की यक उम्र से करते करते

सर्द-महरों सेती पाला न पड़ा था सो पड़ा
हो गए सर्द दम-ए-सर्द के भरते भरते

मंज़िल-ए-इश्क़ न तय होवी ब-क़ौल-ए-'सौदा'
मिल गए ख़ाक में याँ पाँव के धरते धरते