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पारसा तू पारसाई पर न कर इतना ग़ुरूर | शाही शायरी
parsa tu parsai par na kar itna ghurur

ग़ज़ल

पारसा तू पारसाई पर न कर इतना ग़ुरूर

क़ासिम अली ख़ान अफ़रीदी

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पारसा तू पारसाई पर न कर इतना ग़ुरूर
मैं अगर बंदा हूँ आसी पर मिरा मौला ग़फ़ूर

मा-सिवा दीदार ख़्वाहिश है मुझे किस चीज़ की
तू पड़ा फिरता है जन्नत ढूँढता हूर-ओ-क़ुसूर

मैं अगरचे रिंद हूँ तो आप को मैं आप को
ज़ोहद से तेरे मुझे मतलब न कुछ कार-ए-ज़रूर

तेरे तईं ग़र्रा है अपनी पारसाई ज़ोहद का
मेरे तईं अल्लाह के फ़ज़्ल-ओ-करम से है सुरूर

रिंद के मशरब पर ऐ ज़ाहिद तबस्सुम मत करे
भेद उस का कुछ न पावेगा तू है मा'नी से दूर

ज़ख़्म-ए-तेग़-ए-अबरू सह जावे न तुझ से बुल-हवस
एक शम्अ से हुआ था जिस के सुर्मा कोह-ए-तूर

चूतड़ ऊपर सर झुकाना उस को तू समझा है फ़ख़्र
है नहीं क़ाबिल तू फज़्लुल्लाह का ऐ बे-शुऊर

क्या तुझे मालूम है दैर-ओ-हरम की एक राह
बुत-परस्ती उस जगह और इस जगह है यक उमूर

दम ग़नीमत है तो हर दम याद में ले दम के तईं
ज़िक्र दाइम 'आफ़रीदी' हो चराग़-अंदर-क़ुबूर