पानी का अजब तौर था पानी से निकल कर
सैलाब की सूरत था रवानी से निकल कर
सुनने को जो बैठे हैं उन्हें कैसे बताऊँ
किरदार कोई गुम है कहानी से निकल कर
कहनी है कोई बात तो कह सीधी ज़बाँ में
अल्फ़ाज़ के पुर-पेच मआनी से निकल कर
ज़िंदानी-ए-उल्फ़त है कहाँ आज ज़माना
ये देख किसी याद पुरानी से निकल कर
तकता रहा तेज़ी से बदलते हुए मंज़र
फिरता रहा मैं याद सुहानी से निकल कर
भर रक्खा था ख़ुश-बू ने मिरे सेहन को 'शाहीं'
कोने में खिली रात की रानी से निकल कर
ग़ज़ल
पानी का अजब तौर था पानी से निकल कर
जावेद शाहीन

