EN اردو
पाँच दिन को जो यहाँ पर आ गया | शाही शायरी
panch din ko jo yahan par aa gaya

ग़ज़ल

पाँच दिन को जो यहाँ पर आ गया

क़ासिम अली ख़ान अफ़रीदी

;

पाँच दिन को जो यहाँ पर आ गया
मिस्ल-ए-गुल दो रोज़ में कुम्हला गया

ज़िंदगी फुस्ला के ले आई मुझे
कौन ज़ालिम उस जगह बहला गया

क्यूँ छुटा कर एक अदम के ऐश को
दूसरा कोई अदम दिखला गया

हस्ती-ए-मौहूम पर जो ग़ौर की
दोस्तो बे-तरह जी घबरा गया

पेशतर मरने से मरना ख़ूब है
जो कि ये समझाओ वही कुछ पा गया

आह इस दिल ने न मानी एक बात
नासेहा सौ तरह से समझा गया

''अहल-ए-दुनिया काफ़िरान-ए-मुतलक़-अंद''
मसनवी-ए-रूम ये फ़रमा गया

ज़क-ज़क-ओ-बक़-बक़ को अब तू छोड़ दे
तिफ़लगी बर्ना का सब झगड़ा गया

शेब आया अब तो 'अफ़रीदी' समझ
क्या भरोसा दम का है आया गया

कुछ खिला ले खा ले ले जाना नहीं
जो गया है याँ से सो तन्हा गया

कौन है वो फ़क़ीर-ओ-बादशाह
जो कफ़-ए-अफ़्सोस नहिं मलता गया

हसरत-ओ-रंज-ओ-अलम ग़म के सिवा
कोई याँ से वाँ के तईं ले क्या गया

'आफ़रीदी' याँ सदा रहना नहीं
जो गया है वो यही कहता गया