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नित जी ही जी में इश्क़ के सदमे उठाइयो | शाही शायरी
nit ji hi ji mein ishq ke sadme uThaiyo

ग़ज़ल

नित जी ही जी में इश्क़ के सदमे उठाइयो

मिर्ज़ा मोहम्मद तक़ी हवस

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नित जी ही जी में इश्क़ के सदमे उठाइयो
शिकवे की बात मुँह पे 'हवस' तुम न लाइयो

शौक़ इन दिनों हुआ है उसे दास्तान का
यारो कोई मिरी भी कहानी सुनाइयो

रहने दे मेरी ख़ाक तू उस दर पे ऐ सबा
मुश्त-ए-ग़ुबार-ए-ख़स्ता-दिलाँ मत उठाइयो

जी को यक़ीं है हश्र में ढूँडूंगा मैं तुझे
ज़ालिम वहाँ तू मुझ से न मुखड़ा छुपाइयो

इस में ज़ियाँ है जान का सुनता है ऐ 'हवस'
ज़िन्हार बार-ए-इश्क़ न सर पर उठाइयो