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नीले पीले सियाह सुर्ख़ सफ़ेद सब थे शामिल इसी तमाशे में | शाही शायरी
nile pile siyah surKH safed sab the shamil isi tamashe mein

ग़ज़ल

नीले पीले सियाह सुर्ख़ सफ़ेद सब थे शामिल इसी तमाशे में

शमीम हनफ़ी

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नीले पीले सियाह सुर्ख़ सफ़ेद सब थे शामिल इसी तमाशे में
यूरिश-ए-रंग ने ज़लील किया आँख गुम हो गई तमाशे में

कोई भी इन में चारासाज़ न था सभी बीमार-ए-जुस्तुजू निकले
तुम ही सोचो कि बे-दिली किस से रास्ता पूछती तमाशे में

जिस्म का सोना रूप की चाँदी कौन सा धन किसी के पास रहा
एक मेरा तुम्हारा क़िस्सा क्या सारी दुनिया लुटी तमाशे में

चाँद था साहिल-ए-नफ़स के क़रीब एक दिन मेरे दिल में डूब गया
सुब्ह का राज़ राएगाँ ठहरा शाम भी घुल गई तमाशे में

कभी दरिया के साथ साथ बढ़े कहीं ठिठके कहीं नज़र न उठी
एक उम्र-ए-रवाँ थी जी का ज़ियाँ सो गुज़रती रही तमाशे में

एक शोला हवस का बस में न था आप-अपने से हाथ धो बैठे
ख़ाक आग़ाज़ ख़ाक ही अंजाम आग ऐसी लगी तमाशे में