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निगह की शोला-फ़ज़ाई को कम है दीद उस की | शाही शायरी
nigah ki shoala-fazai ko kam hai did uski

ग़ज़ल

निगह की शोला-फ़ज़ाई को कम है दीद उस की

सय्यद काशिफ़ रज़ा

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निगह की शोला-फ़ज़ाई को कम है दीद उस की
चराग़ चाहता है लौ ज़रा मज़ीद उस की

दरून-ए-दिल किसी ज़ख़्म-ए-दहन-कुशा की तरह
बहुत दिनों से तलब है बड़ी शदीद उस की

मिला तो है कोई बिन्त-ए-इनब सा लब लेकिन
हमारे शहर में ममनूअ है कशीद इस की

अब उस का हक़ है बहिश्त-ए-बदन पे जा उठना
निगह हुइ है रह-ए-दीद पर शहीद उस की

मैं सर-ब-ख़ाक हूँ ताकि वो सुर्ख़-रू हो जाए
बपा जो मातम-ए-दिल हो तो फिर हो ईद उस की