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निगाह-ए-बाग़बाँ कुछ मेहरबाँ मा'लूम होती है | शाही शायरी
nigah-e-baghban kuchh mehrban malum hoti hai

ग़ज़ल

निगाह-ए-बाग़बाँ कुछ मेहरबाँ मा'लूम होती है

एज़ाज़ अफ़ज़ल

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निगाह-ए-बाग़बाँ कुछ मेहरबाँ मा'लूम होती है
ज़मीं पर आज शाख़-ए-आशियाँ मा'लूम होती है

बुलाया जा रहा है जानिब-ए-दार-ओ-रसन हम को
मुक़द्दर में हयात-ए-जाविदाँ मा'लूम होती है

निगाहों में हैं किस के आरिज़-ए-गुल-रंग के जल्वे
कि दुनिया गुलिस्ताँ-दर-गुलिस्ताँ मा'लूम होती है

मिरी कश्ती को शिकवा बहर-ए-बे-पायाँ की तंगी का
तुझे एक आबजू भी बे-कराँ मा'लूम होती है

पहुँच कर आसमाँ पर भी तो देखो ऐ ज़मीं वालो
वहाँ से ये ज़मीं भी आसमाँ मा'लूम होती है