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नज़र में नित-नई हैरानियाँ लिए फिरिए | शाही शायरी
nazar mein nit-nai hairaniyan liye phiriye

ग़ज़ल

नज़र में नित-नई हैरानियाँ लिए फिरिए

पीरज़ादा क़ासीम

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नज़र में नित-नई हैरानियाँ लिए फिरिए
सरों पे रोज़ नया आसमाँ लिए फिरिए

अब इस फ़ज़ा की कसाफ़त में क्यूँ इज़ाफ़ा हो
ग़ुबार-ए-दिल है सो दिल में निहाँ लिए फिरिए

यही बचा है सो अब ज़ीस्त की गवाही में
यही निशान-ए-दिल-ए-बे-निशाँ लिए फिरिए

क़रार-ए-जाँ तो सर-ए-कू-ए-यार छोड़ आए
मता-ए-ज़ीस्त है लेकिन कहाँ लिए फिरिए

अजब हुनर है कि दानिश्वरी के पैकर में
किसी का ज़ेहन किसी ज़बाँ लिए फिरिए