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नवाह-ए-शौक़ में है इक दयार-ए-निकहत-ए-गुल | शाही शायरी
nawah-e-shauq mein hai ek dayar-e-nikhat-e-gul

ग़ज़ल

नवाह-ए-शौक़ में है इक दयार-ए-निकहत-ए-गुल

सज्जाद बाक़र रिज़वी

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नवाह-ए-शौक़ में है इक दयार-ए-निकहत-ए-गुल
ज़मीं पे गुल हैं फ़ज़ा में ग़ुबार-ए-निकहत-ए-गुल

ये शहर-ए-गुल-बदनाँ सैर-गाह-ए-हुस्न-ए-तमाम
कहीं है नहर कहीं आबशार-ए-निकहत-ए-गुल

नसीम-ए-सुब्ह भी लेती है याँ पे इज़्न-ए-ख़िराम
है ये मक़ाम मक़ाम-ए-क़रार-ए-निकहत-ए-गुल

गुमाँ ये है कहीं दीवार-ए-रंग टूट न जाए
हिसार-ए-रंग पे है वो फ़िशार-ए-निकहत-ए-गुल

यहाँ के मुर्ग़ान-ए-ख़ुश-इलहान-ओ-मेहर-ए-ज़र-अफ़्शाँ
हैं नूर-ओ-नग़्मा यहाँ हम-कनार-ए-निकहत-ए-गुल

यहाँ की क़ौस-ए-क़ुज़ह को मिला है इज़्न-ए-दवाम
बहार-ए-रंग दलील-ए-बहार-ए-निकहत-ए-गुल

उफ़ुक़ पे नूर का दरिया है रंग की कश्ती
है इंतिज़ार में किस के निगार-ए-निकहत-ए-गुल

किसे ख़बर है कि 'बाक़र' फ़िदा-ए-हुस्न-ए-बहार
यहीं कहीं है ग़रीब-ए-दयार-ए-निकहत-ए-गुल