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नशे में सहवन कर ली तौबा | शाही शायरी
nashe mein sahwan kar li tauba

ग़ज़ल

नशे में सहवन कर ली तौबा

मुनीर शिकोहाबादी

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नशे में सहवन कर ली तौबा
ऐसी भोली इलाही तौबा

हज में जब याद आईं वो आँखें
ताक़-ए-हरम पर रख दी तौबा

वाइ'ज़ों से रिंदों में आई
फिरती है बहकी बहकी तौबा

क़स्में खा कर फिर से पीना
मुँह का निवाला ठहरी तौबा

दाम में फाँसा मौजा-ए-मय ने
इक झटके में टूटी तौबा

बहर-ए-गुनह से पार उतारा
कश्ती-ए-रहमत ठहरी तौबा

पी के 'मुनीर' अब बादा-ए-कौसर
मस्त हुई है मेरी तौबा