नशे में सहवन कर ली तौबा
ऐसी भोली इलाही तौबा
हज में जब याद आईं वो आँखें
ताक़-ए-हरम पर रख दी तौबा
वाइ'ज़ों से रिंदों में आई
फिरती है बहकी बहकी तौबा
क़स्में खा कर फिर से पीना
मुँह का निवाला ठहरी तौबा
दाम में फाँसा मौजा-ए-मय ने
इक झटके में टूटी तौबा
बहर-ए-गुनह से पार उतारा
कश्ती-ए-रहमत ठहरी तौबा
पी के 'मुनीर' अब बादा-ए-कौसर
मस्त हुई है मेरी तौबा
ग़ज़ल
नशे में सहवन कर ली तौबा
मुनीर शिकोहाबादी

