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नर्म लहजे में तहम्मुल से ज़रा बात करो | शाही शायरी
narm lahje mein tahammul se zara baat karo

ग़ज़ल

नर्म लहजे में तहम्मुल से ज़रा बात करो

रफ़ीक़ ख़याल

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नर्म लहजे में तहम्मुल से ज़रा बात करो
फिर ब-सद-शौक़ सर-ए-आम मुझे मात करो

या निसार आज करो मुझ पे तमाम अपने हुनर
या नज़र-बंद मिरे सारे कमालात करो

मैं रिवायात से बाग़ी तो नहीं हूँ लेकिन
तुम से मुमकिन हो तो तब्दील-ए-ख़यालात करो

एक मुद्दत से मिरे दिल का नगर है वीराँ
आओ इस दश्त पे तुम फूलों की बरसात करो

फ़स्ल उजालों की सियह-बख़्त ज़मीं उगलेगी
ज़र-निगार अपने ज़रा कश्फ़-ओ-करामात करो

इस तरह मिल के बिछड़ना तो क़यामत होगा
मुश्तइल तुम न मिरी जाँ मिरे जज़्बात करो

बे-नियाज़ी तो मिला करती है दुनिया से 'ख़याल'
तुम किसी तौर न तज्दीद-ए-ग़म-ए-ज़ात करो