नहीं आराम एक जा दिल को
आह क्या जाने क्या हुआ दिल को
ऐ बुताँ मोहतरम रखो इस को
कहते हैं ख़ाना-ए-ख़ुदा दिल को
ले तो जाते हो मेहरबाँ लेकिन
कीजो मत आप से जुदा दिल को
मुँह न फेरा कभी जफ़ा से तिरी
आफ़रीं दिल को मर्हबा दिल को
ये तवक़्क़ो न थी हमें हरगिज़
कि दिखाओगे ये जफ़ा दिल को
हैं यही ढंग आप के तो ख़ैर
क्यूँ न फिर दीजिएगा आ दिल को
आख़िर उस तिफ़्ल-ए-शोख़ ने देखा
टुकड़े जूँ शीशा कर दिया दल को
आज लगती है कुछ बग़ल ख़ाली
कौन सीने से ले गया दिल को
हम तो कहते हैं तुझ को ऐ 'बेदार'
कीजो मत उस से आश्ना दिल को
ग़ज़ल
नहीं आराम एक जा दिल को
मीर मोहम्मदी बेदार

