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नहीं आराम एक जा दिल को | शाही शायरी
nahin aaram ek ja dil ko

ग़ज़ल

नहीं आराम एक जा दिल को

मीर मोहम्मदी बेदार

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नहीं आराम एक जा दिल को
आह क्या जाने क्या हुआ दिल को

ऐ बुताँ मोहतरम रखो इस को
कहते हैं ख़ाना-ए-ख़ुदा दिल को

ले तो जाते हो मेहरबाँ लेकिन
कीजो मत आप से जुदा दिल को

मुँह न फेरा कभी जफ़ा से तिरी
आफ़रीं दिल को मर्हबा दिल को

ये तवक़्क़ो न थी हमें हरगिज़
कि दिखाओगे ये जफ़ा दिल को

हैं यही ढंग आप के तो ख़ैर
क्यूँ न फिर दीजिएगा आ दिल को

आख़िर उस तिफ़्ल-ए-शोख़ ने देखा
टुकड़े जूँ शीशा कर दिया दल को

आज लगती है कुछ बग़ल ख़ाली
कौन सीने से ले गया दिल को

हम तो कहते हैं तुझ को ऐ 'बेदार'
कीजो मत उस से आश्ना दिल को