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नाज़-पर्वर्दा-ए-जहाँ तुम हो | शाही शायरी
naz-parwarda-e-jahan tum ho

ग़ज़ल

नाज़-पर्वर्दा-ए-जहाँ तुम हो

सुलैमान अरीब

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नाज़-पर्वर्दा-ए-जहाँ तुम हो
दर्द-ओ-ग़म हो जहाँ जहाँ तुम हो

ये ज़मीं भी अगर नहीं मेरी
हाए क्यूँ ज़ेर-ए-आसमाँ तुम हो

मैं ने की थी शिकायत-ए-दरूँ
बे-सबब मुझ से बद-गुमाँ तुम हो

मैं ज़माने से ख़ुद समझ लेता
वक़्त के मेरे दरमियाँ तुम हो

फूटती है वहीं से दर्द की लय
पर्दा-ए-साज़ में जहाँ तुम हो

तुम को पा कर भी सोचता हूँ यही
क्या फ़क़त रंज-ए-राएगाँ तुम हो