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ना-तवाँ वो हूँ निगाहों में समा ही न सकूँ | शाही शायरी
na-tawan wo hun nigahon mein sama hi na sakun

ग़ज़ल

ना-तवाँ वो हूँ निगाहों में समा ही न सकूँ

शाद लखनवी

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ना-तवाँ वो हूँ निगाहों में समा ही न सकूँ
भरूँ आँखों में नज़र सा नज़र आ ही न सकूँ

दिल जलाना है तो ऐ मेहर जला मिस्ल-ए-कबाब
दाग़ कुछ मोहर नहीं है जो उठा ही न सकूँ

तह-ए-शमशीर-ए-दो-दम ख़ुश हूँ ये शीशे की तरह
एक दम संग-दिलों से मैं बना ही न सकूँ

हम-नशीं यार हो क्या ये है नसीबों में फ़िराक़
जोड़ आ'ज़ा के भी उख़ड़ें तो बिठा ही न सकूँ

ख़ुद फ़रामोश हूँ ऐसा कि दिल-ए-बे-ख़ुद से
याद उस बुत की भुलाऊँ तो भुला ही न सकूँ

ख़ामा सा है अज़ली सीना-फ़िगारी मेरी
ज़ख़्म-ए-दिल लाख सिलाऊँ प सिला ही न सकूँ

दस्तरस काकुल-ए-ख़मदार ये होना ही मुहाल
ये वो नागन है जो हाथों पे खिला ही न सकूँ

नाज़नीं ये है कि ऐ 'शाद' नज़र-बाज़ों को
कमर उस की जो दिखाऊँ तो दिखा ही न सकूँ