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न ये शीशा न ये साग़र न ये पैमाना बने | शाही शायरी
na ye shisha na ye saghar na ye paimana bane

ग़ज़ल

न ये शीशा न ये साग़र न ये पैमाना बने

असग़र गोंडवी

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न ये शीशा न ये साग़र न ये पैमाना बने
जान-ए-मय-ख़ाना तिरी नर्गिस-ए-मस्ताना बने

परतव-ए-रुख़ के करिश्मे थे सर-ए-राहगुज़र
ज़र्रे जो ख़ाक से उट्ठे वो सनम-ख़ाना बने

कार-फ़रमा है फ़क़त हुस्न का नैरंग-ए-कमाल
चाहे वो शम्अ बने चाहे वो परवाना बने

उस को मतलूब हैं कुछ क़ल्ब ओ जिगर के टुकड़े
जैब ओ दामन न कोई फाड़ के दीवाना बने

रिंद जो ज़र्फ़ उठा लें वही साग़र बन जाए
जिस जगह बैठ के पी लें वही मय-ख़ाना बने