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न वो फ़रियाद का मतलब न मंशा-ए-फ़ुग़ाँ समझे | शाही शायरी
na wo fariyaad ka matlab na mansha-e-fughan samjhe

ग़ज़ल

न वो फ़रियाद का मतलब न मंशा-ए-फ़ुग़ाँ समझे

सीमाब अकबराबादी

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न वो फ़रियाद का मतलब न मंशा-ए-फ़ुग़ाँ समझे
हम आज अपनी शब-ए-ग़म की ग़लत-सामानियाँ समझे

बड़ी मुश्किल से उन का राज़-ए-उल्फ़त हो सका पिन्हाँ
बड़ी मुद्दत में जा कर हम मिज़ाज-ए-राज़-दाँ समझे

अब आया है तो बैठे चारा-गर ख़ामोश बालीं पर
मिरी बे-चैनियाँ देखे मिरी बे-ताबियाँ समझे

पयाम-ए-शादमानी क्या समझ कर दे कोई उस को
जो तेरे ग़म को तकमील-ए-निशात-ए-दो-जहाँ समझे

मैं इस दुनिया में ऐ 'सीमाब' इक राज़-ए-हक़ीक़त था
समझने की तरह अहल-ए-जहाँ मुझ को कहाँ समझे