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न तो अपने घर में क़रार है न तिरी गली में क़याम है | शाही शायरी
na to apne ghar mein qarar hai na teri gali mein qayam hai

ग़ज़ल

न तो अपने घर में क़रार है न तिरी गली में क़याम है

बेदम शाह वारसी

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न तो अपने घर में क़रार है न तिरी गली में क़याम है
तिरी ज़ुल्फ़ ओ रुख़ का फ़रेफ़्ता कहीं सुब्ह है कहीं शाम है

तिरे इक न होने से साक़िया न वो मय न शीशा-ओ-जाम है
न वो सुब्ह अब मिरी सुब्ह है न वो शाम अब मिरी शाम है

न तो चखना जिस का अज़ाब है न तो पीना जिस का हराम है
सर-ए-बज़्म साक़ी ने दी वो मय कि सुरूर जिस का मुदाम है

मैं दुआएँ दूँ तो वो गालियाँ करें बात बात पर भब्तियाँ
ये अजीब तौर-ओ-तरीक़ हैं ये अजीब तर्ज़-ए-कलाम है

वो सितम से बाज़ न आएँगे यूँही ज़ुल्म करते ही जाएँगे
उन्हें क्या मरे कि जिए कोई उन्हें अपने काम से काम है

मिरा दिल दहलने लगा अभी दो घड़ी तू दूर है हम-नशीं
ख़बर-ए-विसाल नहीं सुनी ये मिरी क़ज़ा का पयाम है

बचे किस तरह से मरीज़-ए-ग़म न तुम आ सको न बुला सको
यही हालतें हैं तो देखना कोई दम में क़िस्सा तमाम है

पिसे दिल हज़ारों तड़प गए जो सिसक रहे थे वो मर गए
उठे फ़ित्ने हश्र बपा हुआ ये अजीब तर्ज़-ए-ख़िराम है

अजब आशिक़ों की नमाज़ है नया 'बेदम' उन का नियाज़ है
कि क़याम है न क़ूऊद है न तो सज्दा है न सलाम है