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न सुनती है न कहना चाहती है | शाही शायरी
na sunti hai na kahna chahti hai

ग़ज़ल

न सुनती है न कहना चाहती है

मंज़ूर हाशमी

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न सुनती है न कहना चाहती है
हवा इक राज़ रहना चाहती है

न जाने क्या समाई है कि अब की
नदी हर सम्त बहना चाहती है

सुलगती राह भी वहशत ने चुन ली
सफ़र भी पा-बरहना चाहती है

तअल्लुक़ की अजब दीवानगी है
अब उस के दुख भी सहना चाहती है

उजाले की दुआओं की चमक भी
चराग़-ए-शब में रहना चाहती है

भँवर में आँधियों में बादबाँ में
हवा मसरूफ़ रहना चाहती है