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न साज़-ओ-मुतरिब न जाम-ओ-साक़ी न वो बहार-ए-चमन है बाक़ी | शाही शायरी
na saz-o-mutrib na jam-o-saqi na wo bahaar-e-chaman hai baqi

ग़ज़ल

न साज़-ओ-मुतरिब न जाम-ओ-साक़ी न वो बहार-ए-चमन है बाक़ी

अख़्तर शीरानी

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न साज़-ओ-मुतरिब न जाम-ओ-साक़ी न वो बहार-ए-चमन है बाक़ी
निगाह-ए-शम-ए-सहर के पर्दे ये नक़्शा-ए-अंजुमन है बाक़ी

ज़माना गुज़रा वो यासमन-बू जुदा हुई हम-कनार हो कर
मगर अभी तक हमारे पहलू में निकहत-ए-यासमन है बाक़ी

भुला चुकी दिल से शाम-ए-ग़ुर्बत हर एक नक़्शा हर एक सूरत
हमारी आँखों में लेकिन अब तक फ़रोग़-ए-सुब्ह-ए-वतन है बाक़ी

ज़माना बदला मिटी जवानी न वो मोहब्बत न ज़िंदगानी
बस एक भोली सी याद है जो ब-रंग-ए-दाग़-ए-कुहन है बाक़ी

मिटा दिए बे-सुतून चर्ख़-ए-कुहन ने शीरीं-लक़ा हज़ारों
मगर मोहब्बत के लब पर अब भी तराना-ए-कोहकन है बाक़ी

हबाब-आसा मुहीत-ए-हस्ती में जो है मिटने को बन रहा है
है इंक़लाब इक नुमूद ऐसी जो ज़ेर-ए-चर्ख़-ए-कुहन है बाक़ी

ग़म-ए-ज़माना की सख़्तियों से हुई है पामाल तब-ए-'अख़्तर'
न वो निशात-ए-कुहन है बाक़ी न वो मज़ाक़-ए-सुख़न है बाक़ी