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न रहबर ने न उस की रहबरी ने | शाही शायरी
na rahbar ne na uski rahbari ne

ग़ज़ल

न रहबर ने न उस की रहबरी ने

शिव रतन लाल बर्क़ पूंछवी

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न रहबर ने न उस की रहबरी ने
मुझे मंज़िल अता की गुमरही ने

बना डाला ज़माने भर को दुश्मन
फ़क़त इक अजनबी की दोस्ती ने

वो क्यूँ मुहताज हो शम्स-ओ-क़मर का
जिला बख़्शी हो जिस को तीरगी ने

बदन काँटों से कर डाला है छलनी
हमारा गुल-रुख़ों की दोस्ती ने

बदल डाला मज़ाक़-ए-गुल-परस्ती
चमन में अध-खिली सी इक कली ने

क़यामत बन गई रहमत सरापा
क्या किया आप की हम-साएगी ने

शिकायत बर्क़ की ऐ 'बर्क़' कैसी?
मुझे फूँका है गुल की पंखुड़ी ने