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न पूछ देख के कितना मलाल होता है | शाही शायरी
na puchh dekh ke kitna malal hota hai

ग़ज़ल

न पूछ देख के कितना मलाल होता है

शबनम शकील

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न पूछ देख के कितना मलाल होता है
जो ख़्वाब देखने वालों का हाल होता है

लबों पे मोहर-ए-ख़मोशी लगाई जाती है
और इस के ब'अद हमीं से सवाल होता है

जब आई शाम-ए-मसाफ़त तो फिर ये राज़ खुला
ज़रा सी देर उरूज ओ ज़वाल होता है

हर एक शख़्स की अपनी ही एक दुनिया है
कहाँ किसी को किसी का ख़याल होता है

हर एक औज-ए-मोहब्बत पे आ नहीं सकता
किसी किसी में ही ऐसा कमाल होता है

रुकी हुई हूँ इक ऐसे सवाल पर 'शबनम'
जवाब जिस का हमेशा मुहाल होता है