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न लतीफ़ शाम की जुस्तुजू न हसीं सहर की तलाश है | शाही शायरी
na latif sham ki justuju na hasin sahar ki talash hai

ग़ज़ल

न लतीफ़ शाम की जुस्तुजू न हसीं सहर की तलाश है

अज़ीज़ वारसी

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न लतीफ़ शाम की जुस्तुजू न हसीं सहर की तलाश है
जो नज़र नज़र को नवाज़ दे मुझे उस नज़र की तलाश है

मिरे हम-सफ़र तुझे क्या ख़बर ये नज़र नज़र की तलाश है
मिरी राहबर को है जुस्तुजू तुझे राहबर की तलाश है

जो अजल को जाने हयात-ए-नौ जो हयात-ए-नौ को अजल कहे
मुझे रह-गुज़ार-ए-हयात में उसी हम-सफ़र की तलाश है

न हो फ़र्क़ दैर-ओ-हरम जहाँ न हो अपना अपना सनम जहाँ
उसी रहगुज़र की तलाश थी उसी रहगुज़र की तलाश है

जो बस एक पहली निगाह में मिरे दिल का राज़ समझ सके
मुझे इब्तदा-ए-हयात से इसी दीदा-वर की तलाश है

मिरे ज़ौक़-ए-दर्द का हौसला सर-ए-बज़्म कहता है बरमला
वो 'अज़ीज़' कैफ़ से दूर है जिसे चारागर की तलाश है